नाना पाटेकर : 35 रु की नौकरी से क्रांतिवीर तक
दैनिक जनभारत (नई दिल्ली डेस्क)|भारतीय सिनेमा में कुछ कलाकार अपनी खूबसूरती से पहचाने जाते हैं, कुछ लोकप्रियता से और कुछ अभिनय क्षमता से। लेकिन नाना पाटेकर ऐसे अभिनेता थे, जिनकी पहचान किसी एक विशेषता में समेटना बहुत कठिन है। उनके चेहरे पर सामान्य भारतीय की बेचैनी, उनकी आवाज में व्यवस्था के प्रति आक्रोश, आंखों में संघर्षों की छाया और अभिनय इतना नेचुरल कि दर्शक अक्सर अभिनेता और उसके किरदार के बीच अंतर भूल जाता था।
वह न परंपरागत नायक थे, न फिल्मी दुनिया की चमक-दमक में सहजता से समाने वाले सितारे। उन्होंने अपना रास्ता बनाया और अपनी शर्तों पर चलते रहे।
एक जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मुरुड-जंजीरा में एक मराठी परिवार में जन्म लेने वाले नाना पाटेकर का असली नाम विश्वनाथ पाटेकर था।
उनके पिता गजानन पाटेकर टेक्सटाइल पेंटर और व्यवसायी थे, जबकि मां निर्मला पाटेकर गृहिणी थीं। नाना ने मुंबई में पढ़ाई की और सर जे.जे. इंस्टीट्यूट ऑफ एप्लाइड आर्ट से कमर्शियल आर्ट की शिक्षा हासिल की। पढ़ाई के साथ ही उनका झुकाव कला और अभिनय की ओर बढ़ने लगा था।
फिल्मों में आने से पहले नाना ने बतौर कमर्शियल आर्टिस्ट काम किया। आर्थिक संघर्ष के दौर में उन्होंने विज्ञापन एजेंसी में काम करने के साथ फिल्मों के पोस्टर बनाने और दूसरे छोटे-मोटे काम भी किए। एक समय ऐसा भी था जब उन्हें अपनी रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ता था। बाद में रंगमंच उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। नाना ने स्वयं कई मौकों पर बताया कि थिएटर ने उन्हें अभिनय की बारीकियां सीखने और खुद को कलाकार के तौर पर मजबूत बनाने में मदद की।
उनका अभिनय किसी सुविधासंपन्न जीवन की कल्पनाओं से नहीं, बल्कि साधारण मनुष्य के अनुभवों से उपजा प्रतीत होता था। उनके किरदारों में मजदूर की थकान, किसान की विवशता, व्यवस्था से निराश नागरिक का गुस्सा और अस्तित्व के लिए संघर्ष करते मनुष्य की बेचैनी दिखाई देती थी।
थियेटर में लंबे समय तक काम करने के बाद उन्हें फिल्मों में आने का मौका मिला। वर्ष 1978 की फिल्म ‘गमन’ से उन्होंने हिंदी सिनेमा में कदम रखा। इस फिल्म में उनके साथ स्मिता पाटिल भी थीं। नाना के अनुसार, फिल्मों में आने के लिए स्मिता पाटिल ने भी उन्हें प्रोत्साहित किया था। इसके बाद उन्होंने ‘सलाम बॉम्बे में काम किया।
वो ऐसा दौर चल रहा था कि उस दौर में नायक के लिये सुंदर चेहरा, आकर्षक व्यक्तित्व, रोमांस और नृत्य लोकप्रिय हीरो की प्रमुख शर्तें थीं। नाना ने इन स्थापित मान्यताओं को चुनौती दी। उन्होंने साबित किया कि अभिनय की असली ताकत चेहरे की बनावट नहीं, चरित्र की विश्वसनीयता होती है।
नाना ने आत्महत्या की वजह से पीड़ित परिवारों की इतनी मदद की कि वो लोगों के लिये मिसाल बन गई। नाना ने हमेशा कहा कि आत्महत्यायें सार्वजनिक विमर्श का विषय बनती हैं, तब लोकप्रिय कलाकारों की सामाजिक जिम्मेदारी क्या होनी चाहिए? नाना ने अपने ढंग से इसका उत्तर दिया। उन्होंने दिखाया कि प्रसिद्धि केवल निजी सफलता का साधन नहीं, सामाजिक हस्तक्षेप का माध्यम भी बन सकती है।
नाना पाटेकर ने वर्ष 1978 में नीलकांति पाटेकर से विवाह किया। नीलकांति बैंक में अधिकारी के तौर पर काम कर चुकी थीं और थिएटर से भी जुड़ी थीं। नीलकांति की अभिनय में खास दिलचस्पी थी और उन्होंने मराठी थिएटर में काम किया था। दोनों की मुलाकात थिएटर के दौरान हुई थी। बिना किसी बड़े खर्च के बिल्कुल साधारण ढंग दोनों की शादी हुई थी, उस विवाह में कुल खर्च महज ₹750 आया था। दोनों के दो बेटे हुए दुर्वासा और मल्हार पाटेकर। बड़े बेटे दुर्वासा की मृत्यु लगभग तीन साल की उम्र में बीमारी के चलते हो गई थी। छोटे बेटे मल्हार फिल्ममेकिंग से जुड़े हुए हैं और अपने पिता के प्रोडक्शन से जुड़े काम भी संभालते रहे हैं।
शादी के बाद बहुत वर्षों तक दोनों साथ रहे लेकिन बाद में अलग हो गये लेकिन कभी दोनों ने तलाक नहीं लिया और कोई आपसी मतभेद भी नहीं था।
नाना पाटेकर उन चुनिंदा अभिनेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने अभिनय के लिए तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीते। 1990 में ‘परिंदा’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। इसके बाद 1995 में ‘क्रांतिवीर’ के लिए उन्होंने सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार जीता। ‘क्रांतिवीर’ में प्रताप नारायण तिलक का उनका किरदार आज भी हिंदी सिनेमा के यादगार पात्रों में गिना जाता है। 1997 में ‘अग्निसाक्षी’ के लिए नाना को एक बार फिर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। इस तरह उन्होंने अभिनय की तीन अलग-अलग भूमिकाओं के लिए राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा साबित की।
नाना को केवल गंभीर और क्रोधपूर्ण भूमिकाओं तक सीमित करना भी उचित नहीं होगा। वर्ष 2007 की वेलकम में उदय शेट्टी का उनका किरदार इसका प्रमाण है। उन्होंने अपनी विशिष्ट शैली से हास्य अभिनय में भी अलग पहचान बनाई। वेलकम का उदय शेट्टी और क्रांतिवीर का प्रताप नारायण तिलक बिल्कुल भिन्न चरित्र थे, लेकिन दोनों में नाना की प्रतिभा समान रूप से दिखाई देती थी।
यही बड़े अभिनेता की पहचान है कि वह अपने व्यक्तित्व को किरदार पर थोपने के बजाय किरदार को अपने भीतर उतार ले।उनके निर्देशन में बनी प्रहार ने सैन्य अनुशासन, सामाजिक मूल्यों और नागरिक जिम्मेदारी को लेकर उनकी चिंताओं को अभिव्यक्ति दी। भारतीय सेना से उनका जुड़ाव केवल फिल्मी भूमिका तक सीमित नहीं रहा। उन्हें प्रादेशिक सेना में मानद अधिकारी का दर्जा भी मिला।
भारतीय सिनेमा में उनके योगदान को देखते हुए सरकार ने वर्ष 2013 में नाना पाटेकर को पद्मश्री से सम्मानित किया। आधिकारिक पद्म पुरस्कार रिकॉर्ड में उनका नाम ‘श्री विश्वनाथ दिनकर पाटेकर उर्फ नाना पाटेकर’ के रूप में कला क्षेत्र में दर्ज है।
आठ अक्टूबर 2026 को 75 वर्ष की आयु में नाना पाटेकर का गोवा में निधन हो गया।
उनका जीवन विरोधाभासों से मुक्त नहीं था। उनमें क्रोध भी था और करुणा भी, कठोरता भी थी और संवेदनशीलता भी।संभवतः इन्हीं विरोधाभासों ने उनके अभिनय को इतना मानवीय बनाया। नाना ने सिद्ध किया कि साधारण चेहरा, असाधारण प्रतिभा और जीवन के प्रति गहरी संवेदनशीलता किसी कलाकार को शिखर तक पहुंचा सकती है।
नाना पाटेकर का निधन केवल एक अभिनेता का जाना नहीं है, बल्कि भारतीय सिनेमा के एक ऐसे दौर का अंत है जिसने अभिनय को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया. उनकी आवाज,उनके डाइलोग,उनके किरदार की सादगी और गहराई, आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी.




